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आइए पत्र लिखें,........ किसको-क्यों

Posted by khaskhabar.com
lets write letter

इस चक्राकार धरात्री पर होने वाला प्रत्येक कृत्य मानस मन को प्रभावित करता है। उससे होने वाली प्रतिक्रिया को मन व्यक्त करना चाहता है। मन की यह अभिव्यक्ति कौन सा स्वरूप धारण करेगी इसका निर्धारण मन में प्रतिक्रिया के मुखरित होने से पूर्व ही हो जाता है। सुव्यवस्थित स्थिति बनाए रखने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि मन में उठने वाली उस प्रतिक्रिया की जानकारी मिल जाए अथवा दे दी जाए। दोनों ही श्रेयस्कर स्थितियां हैं और यह पत्र लेखन से ही संभव है।
इस जानकारी का माध्यम अभिव्यक्ति है जिसे बोल अथवा लिख कर प्रकट किया जाता है। यूं तो माध्यम और भी हैं पर इस आलेख का सरोकार पत्र लेखन से ही है। आलेख का आधा शीर्षक जहां प्रेरणादायक है वहीं आधा प्रेरणा में विवेक को जगाने वाला है। पत्र लिखें क्योंकि हम चाहते हैं। लिखना जानते हैं। लिखना ही हमारी अनेक जिज्ञासाओं का समाधान है। आधा शीर्षक ...... "किसको-क्यों" इसे आपके विवेक को पॉजीटिव सोच देने के उद्देश्य से लिखा गया है। क्योंकि अनेक बार पत्र लिखने का विचार तो आता है लेकिन लिखते नहीं। यह विचार अक्सर "किसको और क्यों" के प्रश्न से टकराकर तिरोहित हो जाता है क्योंकि अक्सर पत्र का जवाब नहीं मिलता। कभी कभी तो उलटी परेशानी ख़डी हो जाती है आदि आदि। पत्र स्वार्थ तथा परमार्थ परक होते हैं। दोनों ही विधाएं तब आहत होती हैं जब पत्र का कोई उत्तर नहीं मिलता। उत्तर तो दूर की बात है पहुंचने की सूचना तक नहीं मिलती। इस प्रकार बहुत सी बातें जो नहीं होनी चाहिए हो जाती हैं, जो होनी चाहिएं, रह जाती हैं। मन की मन में रह जाती है। पछतावा होता है, काश पत्र लिख ही देते।
वास्तव में हमें विचार करना है कि ऎसी स्थिति में क्या हमें हमारी एकमात्र शक्ति जो सभ्य और शालीन है, का प्रयोग करना बंद कर देना चाहिए या कि किसी संस्था, व्यक्ति, सरकारी विभाग और अन्य बातों से संबंधित कोई घटना क्यों न हो हमें अपनी प्रतिक्रिया पत्र लिखकर अवश्य ही व्यक्त करनी चाहिए।
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओगामा को प्रतिदिन चालीस हजार पत्र प्राप्त होते हैं। जिनके द्वारा पत्र लेखक का सीधा संवाद उनसे होता है। उनका कार्यालय किसी प्रकार का व्यवधान इस प्रक्रिया में नहीं डालता। प्रतिदिन दस चुने हुए पत्रों को ओबामा पढते हैं जिससे उन्हें नागरिकों की नब्ज का पता चलता रहता है। साथ ही देशवासी भी यह समझता है कि वह राष्ट्रपति के करीब है।
खुशी की बात है कि भारत में भी कई समाचार पत्र पाठकों के भरोसे को जीवंत रखने के लिए ऎसा कॉलम भी चलाते हैं जिसके द्वारा वे शिकायतकर्ता की शिकायत को दूर करवाकर इसकी सूचना प्रकाशित करते हैं। ऎसे समाचार भी पढने में आए हैं जब उच्चा न्यायालय ने पत्र को ही याचिका मानकर कार्यवाही शुरू कर दी है।
सवाईमाधोपुर में रणथम्भौर स्थित विश्वविख्यात त्रिनेत्र गणेशजी को देश के विभिन्न स्थानों से लोग अपनी समस्याओं को लेकर पत्र लिखते हैं, जिन्हें डाक विभाग वहां पहुंचाता है। मंदिर के महंत उन पत्रों को बांच कर भगवान को सुनाते हैं। लिखे हुए पत्र कभी व्यर्थ नहीं जाते। इस विश्वास को बचाए रखते हुए पत्र लिखने की अपनी आदत को त्यागे नहीं अपितु बदलते परिवेश और विश्वास में मार्ग दर्शन करते हुए निरंतर अपना सहयोग दें।
चंद्रदेव भारद्वाज


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